11 अक्टूबर 2001 को ट्रिनिडाड में जन्मे भारतीय मूल के लेखक सर विदियाधर सूरजप्रसाद नायपॉल (V.S. Naipaul) को साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला। यह वही पुरस्कार था जिसके बारे में नायपॉल ने कई बार कहा था कि उन्हें कभी नहीं मिलेगा। स्वीडिश अकादमी के प्रमुख हॉरास एंगडाल ने स्वयं उन्हें फोन पर यह सूचना दी और बाद में कहा कि “वे बहुत हैरान थे और ऐसा नहीं लग रहा था कि वह दिखावा कर रहे हों।”
69 वर्षीय नायपॉल ने हमेशा कहा था कि स्वीडिश अकादमी केवल “राजनीतिक रूप से सही” लेखकों को प्राथमिकता देती है, और उनके पश्चिम समर्थक विचार तथा तीसरी दुनिया की आलोचनात्मक दृष्टि उन्हें इस सूची से बाहर रखती है। फिर भी, इस वर्ष उन्होंने वही पुरस्कार जीत लिया जिसे पाने की उन्होंने कभी उम्मीद नहीं की थी।
नायपॉल का भारत के साथ एक जटिल और विरोधाभासी रिश्ता रहा है। उनके पूर्वज भारत से ट्रिनिडाड गए थे, और उन्होंने भारत पर कई बार लिखा। उनकी शुरुआती किताबें An Area of Darkness (1960 के दशक) और India: A Wounded Civilization (1970 के दशक) भारत की सख्त आलोचना करती हैं। वहीं उनकी बाद की रचना India: A Million Mutinies Now (1990 के दशक) कहीं अधिक सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण रखती है।
पुरस्कार की घोषणा के बाद नायपॉल ने अपने आधिकारिक वक्तव्य में कहा, “यह इंग्लैंड, मेरे घर, और भारत, मेरे पूर्वजों के घर, दोनों के लिए एक महान श्रद्धांजलि है।” उन्होंने अपने जन्मस्थान ट्रिनिडाड का उल्लेख नहीं किया, जिसके बारे में कहा जाता है कि वे उसे पसंद नहीं करते। उन्होंने इसे “एक अप्रत्याशित सम्मान” बताया।
पुरस्कार की घोषणा के बाद उठी बहस में हिंदुस्तान टाइम्स ने 16 अक्टूबर 2001 को अपने संपादकीय “The Two Naipauls” में सवाल उठाया – “नायपॉल को नोबेल पुरस्कार साहित्य के लिए मिला है या पत्रकारिता के लिए?” संपादकीय ने कहा कि लोगों का ध्यान उनके उपन्यासों से ज़्यादा उनके विचारों और विवादास्पद लेखन पर है।
संपादकीय में लिखा गया, “जो लोग उनकी प्रशंसा करते हैं या आलोचना, वे ज़्यादातर उनकी पत्रकारिता पर ध्यान केंद्रित करते हैं, खासकर उनके भारत और इस्लाम पर आधारित लेखों पर।” अख़बार ने यह भी कहा कि नायपॉल की किताबें अब ज़्यादा नहीं बिकतीं और उनकी हाल की रचनाओं का कोई बड़ा साहित्यिक प्रभाव नहीं पड़ा है। “अरुंधति रॉय की The God of Small Things की बिक्री शायद नायपॉल की सभी किताबों की कुल बिक्री से ज़्यादा है,” संपादकीय में कहा गया।
HT ने आगे लिखा कि नायपॉल की प्रसिद्धि उनके विवादों से अधिक जुड़ी है, विशेषकर इस्लाम पर उनकी आलोचना और उनके तीखे व्यक्तिगत विचारों के कारण। लोगों को यह भी याद है कि उन्होंने ई.एम. फॉर्स्टर को “importuning homosexual” कहा था और यह भी कहा था कि उन्हें सलमान रुश्दी की किताबें पसंद नहीं। इन बयानों ने उन्हें मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर चर्चा का विषय बना दिया। संपादकीय के अंत में कहा गया, “इतिहास तय करेगा कि वी.एस. नायपॉल वास्तव में साहित्य के नोबेल पुरस्कार के योग्य थे या नहीं।”





