झारखंड की जानी-मानी और लोकप्रिय महिला नेता, पूर्व विधायक अंबा प्रसाद, एक बार फिर सुर्खियों में हैं। अपने जनसेवा और सरल छवि के लिए प्रसिद्ध अंबा प्रसाद को 48 लाख रुपये के कथित गबन मामले में पुलिस द्वारा दी गई क्लीन चिट को लेकर दाखिल प्रोटेस्ट पिटीशन पर न्यायालय में सुनवाई हुई है। न्यायालय ने निष्पक्षता बरकरार रखते हुए याचिका स्वीकार की है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि अंबा प्रसाद के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं मिला है और जांच प्रक्रिया पारदर्शी रही है।
यह मामला कर्णपूरा महाविद्यालय में हुए कथित गबन से जुड़ा है। प्रारंभ में पुलिस ने इस प्रकरण में प्राथमिकी दर्ज करने से इनकार कर दिया था, जिसके बाद शिकायतकर्ता ने न्यायालय में शिकायतवाद याचिका दायर की थी। न्यायालय के आदेश पर बड़कागांव थाना (113/21) में तत्कालीन विधायक अंबा प्रसाद सहित अन्य के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई थी।
जांच के बाद पुलिस ने अंबा प्रसाद और अन्य को निर्दोष बताते हुए रिपोर्ट न्यायालय में दाखिल की। पुलिस ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि इस मामले में किसी प्रकार का आर्थिक अपराध या गबन का प्रमाण नहीं मिला। इसके बावजूद शिकायतकर्ता पक्ष ने पुलिस की रिपोर्ट के खिलाफ प्रोटेस्ट पिटीशन दायर की और साथ ही जांच अधिकारियों के खिलाफ भी कार्रवाई की मांग की। प्रारंभिक सुनवाई के बाद न्यायालय ने याचिका स्वीकार कर ली है, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि जांच निष्पक्ष तरीके से जारी रहेगी।
इस बीच, प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा दर्ज ECIR में हजारीबाग जिले की कुल 16 प्राथमिकी शामिल की गई हैं, जिनमें बड़कागांव थाना की यही प्राथमिकी (113/21) भी सम्मिलित है। ईडी की जांच में भी इस केस का उल्लेख है, हालांकि अब तक अंबा प्रसाद के खिलाफ किसी प्रत्यक्ष साक्ष्य की पुष्टि नहीं हुई है।
अंबा प्रसाद के समर्थकों का कहना है कि उन्हें राजनीतिक साजिश के तहत इस मामले में फंसाने की कोशिश की गई थी। उनका कहना है कि न्यायालय की प्रक्रिया और पुलिस जांच दोनों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पूरा मामला तथ्यों से अधिक राजनीति से प्रेरित था। पुलिस रिपोर्ट और न्यायालय के रुख ने यह साफ कर दिया है कि अंबा प्रसाद के खिलाफ कोई ठोस सबूत मौजूद नहीं है।
राजनीतिक गलियारों में माना जा रहा है कि यह फैसला अंबा प्रसाद की साफ-सुथरी छवि और ईमानदार सार्वजनिक जीवन की पुष्टि करता है। उन्होंने हमेशा विकास, शिक्षा और जनहित के मुद्दों पर काम किया है। न्यायालय की इस प्रक्रिया ने एक बार फिर यह साबित किया है कि सच्चाई देर से सही लेकिन हमेशा सामने आती है। अंबा प्रसाद के समर्थकों और आम जनता के बीच इस फैसले को लेकर राहत और सम्मान की भावना देखने को मिल रही है।





