धनतेरस पर जमशेदपुर में दिखा देसी रौनक का जादू, “वोकल फॉर लोकल” की गूंज से महके बाजार

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इस बार धनतेरस पर जमशेदपुर ने दिखाई अपनी असली चमक, जब मिट्टी के दीयों और देसी खुशबू ने बताया कि अपनापन ही सबसे बड़ा ब्रांड है।

जमशेदपुर: इस साल की धनतेरस ने जमशेदपुर के बाजारों में एक अलग ही चमक बिखेर दी। जहां पिछले कुछ वर्षों में लोग आधुनिकता और ऑनलाइन शॉपिंग की ओर बढ़ते दिखे थे, वहीं इस बार शहर के लोगों ने अपनी परंपरा और संस्कृति को खुलकर गले लगाया। इस धनतेरस पर “वोकल फॉर लोकल” का असर साफ़ तौर पर देखा गया। हर गली, हर बाजार में मिट्टी की सोंधी खुशबू, दीयों की रोशनी, और स्थानीय कारीगरों के चेहरे पर चमक, सब कुछ इस बात का प्रमाण थे कि जमशेदपुर ने इस बार अपने जड़ों की ओर लौटने का संकल्प लिया है।

साकची, बिष्टुपुर, कदमा, गोलमुरी और मानगो जैसे इलाकों में लोगों की भारी भीड़ उमड़ी। स्थानीय दुकानों पर ग्राहकों की ऐसी रौनक लंबे समय बाद देखने को मिली। इस बार लोगों ने न सिर्फ सोना-चांदी या बर्तन खरीदे, बल्कि बड़ी संख्या में मिट्टी के दीये, पारंपरिक फूलों की माला, हस्तनिर्मित दीप सजावट, और देसी मिठाइयां भी खरीदीं। दुकानदारों के चेहरे पर जो मुस्कान थी, वह यह बताने के लिए काफी थी कि “वोकल फॉर लोकल” सिर्फ नारा नहीं, बल्कि अब लोगों की सोच बन चुका है।

स्थानीय कुम्हारों और कलाकारों के लिए यह धनतेरस किसी त्यौहार से कम नहीं रहा। स्थानीय दुकानदार बताते हैं, “पिछले कुछ सालों से लोग बाजारों से चाइनीज़ लाइट और प्लास्टिक के दीये खरीदते थे, पर इस बार सबने हमारे मिट्टी के दीयों को अपनाया। तीन दिन से लगातार काम चल रहा है, हाथ दर्द हो गए हैं, लेकिन मन बहुत खुश है कि लोग फिर अपनी मिट्टी से जुड़ रहे हैं।”

सिर्फ खरीदारी में ही नहीं, बल्कि लोगों के पहनावे और सजावट में भी इस बार भारतीयता की झलक देखने को मिली। महिलाएं पारंपरिक साड़ी और गहनों में नज़र आईं, तो बच्चों ने भी छोटे-छोटे दीये सजाकर अपने घरों की चौखट रोशन की। मिठाई की दुकानों पर लंबी कतारें लगी रहीं, लड्डू, पेड़ा, बर्फी जैसी देसी मिठाइयों की मांग बढ़ी रही।

इस मौके पर जमशेदपुर की कलाकार सागरिका भौमिक ने भी अपनी भावनाएं साझा करते हुए कहा कि इस साल लोगों में जागरूकता स्पष्ट रूप से बढ़ी है। उन्होंने बताया कि अब लोग अपनी भारतीय परंपरा और संस्कृति को दिल से अपनाने लगे हैं और “वोकल फॉर लोकल” के संदेश को सच्चे अर्थों में जी रहे हैं। सागरिका ने भी इस धनतेरस पर कई पारंपरिक वस्तुएं खरीदीं और कहा कि “जब हम अपनी मिट्टी से जुड़ी चीज़ें खरीदते हैं, तो केवल वस्तुएं नहीं, बल्कि अपनी जड़ों को मजबूत करते हैं।”

जमशेदपुर की सामाजिक संस्थाओं और व्यापार मंडलों ने भी लोगों से अपील की कि वे स्थानीय व्यापारियों से खरीदारी करें ताकि शहर की अर्थव्यवस्था मजबूत हो। इस बार यह अपील लोगों के दिलों तक पहुंचती दिखी। कई लोगों ने सोशल मीडिया पर भी अपने “लोकल खरीदारी” के अनुभव साझा किए, जिससे औरों को भी प्रेरणा मिली।

धनतेरस की शाम जब पूरे शहर में दीये जल उठे, तो यह नज़ारा सिर्फ त्योहार की रौनक नहीं, बल्कि एक नए सोच का प्रतीक है कि विकास के इस दौर में भी हम अपनी जड़ों को नहीं भूल सकते। इस साल जमशेदपुर ने साबित कर दिया कि आधुनिकता और परंपरा साथ-साथ चल सकते हैं। यह त्योहार सिर्फ रोशनी का नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता, स्थानीयता और अपनी संस्कृति से जुड़ने का उत्सव बन गया। सच कहा जाए तो इस बार धनतेरस ने जमशेदपुर को सिर्फ उजाला नहीं दिया, बल्कि अपनी मिट्टी पर गर्व करने का नया कारण भी दिया है।

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