सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2024 में दिया था आदेश, UGC के अधिकार क्षेत्र में आने वाली डिग्रियां नहीं दे सकता उत्तर प्रदेश मदरसा बोर्ड
रांची : झारखंड राज्य अल्पसंख्यक आयोग के चेयरमैन हिदायतुल्लाह ख़ान ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को पत्र लिखकर आलिम-फाजिल डिग्रियों को रद्द कर दिया है। इन डिग्रियों को मान्यता न देने के फैसले को लेकर राज्य अल्पसंख्यक आयोग ने हस्तक्षेप करते हुए कहा है कि इससे झारखंड के मुस्लिम अल्पसंख्यक समुदाय में तीव्र नाराजगी है। आयोग ने शासन से इस मामले में सकारात्मक पहल कर शीघ्रता से मंजूरी देने का अनुरोध किया है। उन्होंने वही पत्र उच्च शिक्षा मंत्री सुदीव्य कुमार सोनू और अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री हफीज़ुल हसन को भी भेजा है।
चेयरमैन ने अपने पत्र में बताया है कि आलिम और फाजिल डिग्रियों के रद्दीकरण तथा उनकी मान्यता न देने को लेकर राज्य भर के मुस्लिम समुदाय में व्यापक असंतोष है और कई जिलों से आयोग के समक्ष शिकायतें आई हैं। आयोग ने 23 सितंबर 2025 को अपनी बैठक में इस मुद्दे पर चर्चा कर एक प्रस्ताव पारित किया था, जिसे सरकार को भेजा गया। उक्त बैठक की कार्यवाही की प्रति (पत्र संख्या 150, दिनांक 29/10/2025) आयोग के सचिवालय से सरकार को भेज दी गई है।
पत्र में आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के 5 नवंबर 2024 के आदेश का संदर्भ दिया है, जिसमें उत्तर प्रदेश मदरसा बोर्ड की आलिम-फाजिल डिग्रियों से संबंधित प्रकरण पर कहा गया कि मदरसा बोर्ड UGC के अधिकार क्षेत्र में आने वाली डिग्रियां नहीं दे सकता और इस संदर्भ में निर्णय लेना उत्तर प्रदेश सरकार की जिम्मेदारी है। आयोग ने स्पष्ट किया है कि सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय उत्तर प्रदेश मदरसा बोर्ड अधिनियम 2004 से संबंधित था और इसे झारखंड के संदर्भ-विशेषकर झारखंड एकेडमिक काउंसिल (JAC) द्वारा दी गई आलिम-फाजिल डिग्रियों पर स्वतः लागू मान लेना उचित नहीं है।
आयोग ने आरोप लगाया है कि JAC के अधिकारी बिना विधि विभाग से सलाह लिए और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के प्रासंगिक दायरे को समझे बगैर, पहले से जारी की गई आलिम-फाजिल डिग्रियों को असंवैधानिक करार दे रहे हैं तथा निर्णय को पूर्व प्रभाव से लागू करने पर अड़े हुए हैं, यानी उन डिग्रियों पर भी प्रभाव डालने का प्रयास हो रहा है जो वर्षों पहले जारी की जा चुकी हैं। आयोग ने कहा है कि इस प्रकार का व्यवहार सैकड़ों युवाओं के भविष्य को अनिश्चितता में डाल रहा है और इससे सरकार की छवि भी प्रभावित हो रही है।
पत्र में आगे कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी बिहार सहित अन्य राज्यों में आलिम-फाजिल डिग्रियां दी जा रही हैं और उन डिग्रियों के आधार पर युवाओं को नौकरी के अवसर मिल रहे हैं। जबकि झारखंड में JAC द्वारा दी गई डिग्रियों के आधार पर कई उम्मीदवार सरकारी नौकरियों में कार्यरत हैं और 2023–2024 में आलिम-फाजिल डिग्री धारकों की नियुक्तियां भी हुई हैं। ऐसे में अचानक से उनकी वैधता पर सवाल उठाने से हजारों प्रभावित हो रहे हैं।
आयोग ने यह भी बताया कि झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (JSSC) आलिम-फाजिल से प्रशिक्षित उम्मीदवारों के अंतिम परिणाम जारी नहीं कर रहा है, विशेषकर वे उम्मीदवार जो 2023 में दस्तावेज सत्यापन के बाद सहायक प्राध्यापक (भाषा) के पद के लिए आवेदन कर चुके हैं। इसी तरह फाजिल डिग्री धारकों को सेकेंडरी प्रोफेसर (भाषा) के पद में भी शामिल नहीं किया जा रहा है। इन घटनाओं के कारण शिक्षा विभाग और JSSC के प्रति अल्पसंख्यक समुदाय विशेषकर मुस्लिम समुदाय में भारी नाराजगी और विभिन्न जिलों में विरोध प्रदर्शन बढ़ रहे हैं।
चेयरमैन ने पत्र में इतिहास और विधिक प्रावधानों का संदर्भ देते हुए बताया कि 2003 से JAC मदरसा आलिम-फाजिल की परीक्षा आयोजित कर रहा है और यह सरकार के निर्णय के अनुरूप UG/PG के समकक्ष मानी जाती रही है। JAC ने इसे बिहार पुनर्गठन अधिनियम 2000 के अंतर्गत लिया था और इसे पत्र संख्या JAC/3/062/062/39/062 के माध्यम से अधिसूचित भी किया गया था। इससे पहले बिहार सरकार के कार्मिक विभाग ने 11/03/1977 के आदेश संख्या 4226 एवं 4236 के माध्यम से विश्वविद्यालय-स्तरीय पाठ्यक्रम विशेषज्ञों द्वारा तैयार पाठ्यक्रम लागू करवाया था। झारखंड में इस डिग्री के आधार पर कई शिक्षक और सरकारी कर्मी आज भी सेवा में हैं।
पत्र में यह भी इंगित किया गया है कि आयोग को कई जिलों से यह शिकायत मिली है कि बिहार में नीतीश कुमार की सरकार ने आलिम-फाजिल डिग्रियों को बरकरार रखा है, जबकि झारखंड में सरकार ने इन्हें निलंबित कर दिया है, जिससे यह धारणा बन रही है कि राज्य सरकार अल्पसंख्यकों के प्रति असहज रवैया अपना रही है। इस प्रकार की धारणा सामाजिक असंतुलन और जन-आक्रोश को जन्म दे सकती है, जो सरकार के लिए चिंताजनक है।
अल्पसंख्यक आयोग ने सरकार से तत्काल प्रभाव से विचार करने और शीघ्र समाधान निकालने का आग्रह करते हुए कुछ सुझाव भी दिए हैं।
1. 2003–2023 तक JAC द्वारा जारी आलिम-फाजिल डिग्रियों की वैधता और मान्यता को BA एवं MA के समकक्ष बनाए रखा जाए।
2. D.V. (दस्तावेज सत्यापन) पूरा कर चुके आलिम उम्मीदवारों के सहायक प्राध्यापक (भाषा) पद के परिणाम तुरन्त जारी किए जाएं।
3. फाजिल डिग्री धारकों को सेकेंडरी प्रोफेसर भर्ती परीक्षा में मान्यता प्रदान की जाए।
4. वर्तमान सत्र में ही विश्वविद्यालय द्वारा आलिम और फाजिल डिग्री परीक्षाओं का आयोजन सुनिश्चित कराया जाए।
5. बिहार की तरह एक अलग मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय स्थापित कर आलिम-फाजिल परीक्षाएं कराई जाएं, अथवा झारखंड के किसी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय के माध्यम से इन परीक्षाओं का वैधानिक आयोजन किया जाए।
चेयरमैन हिदायतुल्लाह ख़ान ने पत्र के अंत में स्पष्ट किया है कि उन्हें राज्य अल्पसंख्यक आयोग का चेयरपर्सन नियुक्त किया गया है और उनकी ज़िम्मेदारी राज्य के अल्पसंख्यक समुदाय विशेषकर मुस्लिम समुदाय के हितों की रक्षा करना है। इसलिए उन्होंने अनुरोध किया है कि इस मामले पर संवेदनशीलता के साथ शीघ्र और संतुलित निर्णय लिया जाए ताकि झारखंड के हज़ारों युवाओं खासकर शिक्षकों का भविष्य सुरक्षित रहे और समाज में उत्पन्न हो रहे तनाव को रोका जा सके।
आयोग ने शासन से अपील की है कि वे विधिक परामर्श के साथ निष्पक्षता और संवेदनशीलता के साथ इस विषय का समाधान करें, ताकि शिक्षा व रोजगार के अधिकार प्रभावित न हों और सामाजिक सौहार्द बनी रहे।






