बिहार की मिट्टी में कुछ तो खास है। यहाँ की हवा में मेहनत है, दिलों में अपनापन है और परंपराओं में वह गहराई है जो पूरे देश को जोड़ देती है। इन्हीं परंपराओं में सबसे उज्ज्वल और पवित्र परंपरा है छठ महापर्व वह पर्व जो न सिर्फ़ पूजा है, बल्कि बिहारियों की अस्मिता, संस्कार और संस्कृति का प्रतीक है। यही कारण है कि इसे “महापर्व” कहा जाता है, क्योंकि इसकी आस्था साधारण नहीं, बल्कि अद्भुत और अद्वितीय है। चार दिनों तक चलने वाला यह पर्व अपने आप में अनुशासन, तपस्या और भक्ति का अद्भुत संगम है। यह केवल भगवान सूर्य और छठी मइया की आराधना नहीं, बल्कि परिवार, समाज और प्रकृति के बीच गहरे संबंधों का उत्सव भी है। यही वो पर्व है जिसमें एक माँ अपने परिवार की खुशहाली के लिए निर्जला उपवास रखती है, दिनभर तपती धूप में खड़ी रहती है, और शाम को जब सूर्य अस्त होने लगता है, तो उसी क्षण में अपने पूरे मन से धन्यवाद अर्पित करती है।
आज छठ का तीसरा दिन है संध्या अर्घ्य का दिन। अभी कुछ ही घंटों बाद, जब सूरज धीरे-धीरे पश्चिम की ओर ढलेगा, तब घाटों पर दीपों की कतारें जगमगाने लगेंगी। तालाबों और नदियों के किनारे हजारों व्रती महिलाएं पीले वस्त्र पहनकर सूप में ठेकुआ, फल और अन्य प्रसाद सजाएँगी। जब सूर्य की पहली किरण जल पर झिलमिलाएगी, तो पूरा वातावरण भक्ति से भर उठेगा। इस भक्ति के माहौल में संगीत का अपना अलग ही रंग है। छठ पूजा और गीतों का रिश्ता सदियों पुराना है। जैसे-जैसे यह पर्व नज़दीक आता है, वैसे-वैसे भोजपुरी लोकसंगीत की मधुर लहरियाँ हवा में घुलने लगती हैं। हर साल भोजपुरी संगीत जगत के नामचीन गायकों पवन सिंह, खेसारी लाल यादव, शिल्पी राज, प्रियंका सिंह, श्रद्धा सिंहा और कल्पना पटवारी के छठ गीतों से पूरे माहौल को भक्तिमय बना दिया गया है। सोशल मीडिया और यूट्यूब पर इन गीतों की जबरदस्त गूंज है। “कांच ही बांस के बहंगिया”, “उगेला सुरज देव”, “छठी मइया आयिल बाड़ी अँगना” जैसे गीत हर घर में बज रहे हैं। गली-मोहल्लों से लेकर बड़े-बड़े घाटों तक, हर जगह लोग इन सुरों के साथ जुड़ रहे हैं क्योंकि इन गीतों में न सिर्फ़ संगीत है, बल्कि उस मिट्टी की सोंधी खुशबू भी है जहाँ से यह परंपरा जन्मी है।
इस महापर्व की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें सिर्फ़ बिहार या पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोग ही नहीं, बल्कि देश के कोने-कोने से लोग आकर शामिल होते हैं। अगर आप सोच रहे हैं कि यह सिर्फ़ भारत के कुछ राज्यों तक सीमित है तो आप ग़लत हैं। आज छठ का यह उत्सव देश की सीमाओं को पार कर चुका है। नेपाल, मॉरीशस, फिजी, अमेरिका, दुबई और लंदन जैसे देशों में भी प्रवासी भारतीय बड़ी श्रद्धा और उत्साह के साथ इसे मनाते हैं। विदेशों में बसे बिहारी जब अपने घरों की छतों पर बाल्टी और तसले में पानी भरकर सूर्यदेव को अर्घ्य देते हैं, तो वह दृश्य किसी भावनात्मक कविता जैसा लगता है। वहाँ ना गंगा होती है, ना घाट लेकिन आस्था वही होती है, भावना वही होती है, और आवाज़ वही “छठी मइया के जय हो।”
आज की शाम को लेकर श्रद्धालुओं में जबरदस्त उत्साह है। लोग घाटों की सफाई, सजावट और तैयारी में जुटे हैं। स्थानीय प्रशासन और स्वयंसेवक भी सुरक्षा और व्यवस्था को लेकर मुस्तैद हैं। हर किसी के चेहरे पर एक ही उम्मीद है कि आज की शाम उनकी प्रार्थना सूर्यदेव तक ज़रूर पहुँचेगी। और कल सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य देने के साथ इस चार दिवसीय महापर्व का समापन होगा। लेकिन हर उस बिहारी के दिल में छठ की भक्ति पूरे साल तक गूंजती रहती है। यह सिर्फ़ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़े रहने की वो परंपरा है, जिसने बिहार को दुनिया के सामने एक सांस्कृतिक उदाहरण बना दिया है। सच कहा जाए तो छठ वो पर्व है, जहाँ आस्था, संगीत और संस्कार मिलकर एक ऐसी लय रचते हैं जो हर दिल को छू जाती है क्योंकि छठ सिर्फ़ पूजा नहीं, बिहार की आत्मा की आवाज़ है।





