चेन्नई के नाइटक्लब से लेकर बॉलीवुड के मंच तक, ऊषा उथुप की अनसुनी कहानी, जिसने आवाज़ को बनाया पहचान

चेन्नई के नाइटक्लब में गाने से शुरुआत करने वाली ऊषा उथुप ने अपनी दमदार आवाज़ से बॉलीवुड में खास मुकाम बनाया। जानिए कैसे बनीं वो ‘रॉक एंड रोल क्वीन’ और देश की सबसे अनोखी सिंगर।

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चेन्नई के एक छोटे से नाइटक्लब से अपनी यात्रा शुरू करने वाली ऊषा उथुप आज बॉलीवुड की मशहूर सिंगर हैं, जिन्होंने अपनी अनोखी आवाज़ से करोड़ों दिलों को जीता।

कभी चेन्नई के नाइटक्लब में खड़े होकर गाने वाली एक महिला, जिसकी आवाज़ ने रातोंरात लोगों का दिल जीत लिया, आज भारतीय संगीत की सबसे सम्मानित गायिकाओं में गिनी जाती हैं। यह कहानी है ऊषा उथुप की, जिन्होंने अपनी अनोखी और भारी आवाज़ से बॉलीवुड में एक अलग पहचान बनाई।

ऊषा उथुप का सफर बेहद दिलचस्प रहा है। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत चेन्नई के एक नाइटक्लब से की थी, जहां वे महीनेभर के लिए सिर्फ 750 रुपये में गाना गाती थीं। लेकिन उनके लिए यह सिर्फ नौकरी नहीं, बल्कि जुनून था। उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया था कि “मैं क्लब में गाती थी और वही मेरा स्टेज था, वही मेरा सपना।” उनकी यही लगन धीरे-धीरे उन्हें उस मुकाम तक ले गई, जहां आज उनका नाम आदर से लिया जाता है।

कहते हैं कि किस्मत कभी भी पलट सकती है, बस सही वक्त का इंतजार होता है। ऊषा उथुप की जिंदगी में यह वक्त तब आया जब दिग्गज अभिनेता देव आनंद दिल्ली के एक क्लब में उनका लाइव शो देखने पहुंचे। उनकी आवाज़ से प्रभावित होकर देव आनंद ने उन्हें अपनी फिल्म हरे रामा हरे कृष्णा (1971) में गाने का मौका दिया। यही मौका उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट बन गया, और यहीं से शुरू हुआ बॉलीवुड में उनका सुनहरा सफर।

इसके बाद ऊषा उथुप ने एक से बढ़कर एक सुपरहिट गाने गाए। उन्होंने शान, डिस्को डांसर, कभी खुशी कभी ग़म, डॉन 2 और कहानी जैसी फिल्मों में अपनी गूंजदार आवाज़ से जादू बिखेरा। उनकी गायकी में भारतीय सुरों और पश्चिमी तालों का ऐसा मेल था, जिसने उन्हें दूसरों से बिल्कुल अलग बना दिया।

आज जब ऊषा उथुप अपना 78वां जन्मदिन मना रही हैं, तो सोशल मीडिया पर फैंस और संगीतप्रेमी उन्हें बधाई दे रहे हैं। उनकी मुस्कान, उनका आत्मविश्वास और उनकी आवाज़ आज भी उतनी ही ताज़गी भरी है जितनी सालों पहले थी। ऊषा उथुप सिर्फ एक सिंगर नहीं, बल्कि एक प्रेरणा हैं जिन्होंने साबित किया कि अगर मेहनत और लगन सच्ची हो, तो कोई भी मंच छोटा नहीं होता।

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