करनडीह में ओलचिकी शताब्दी समारोह बना ऐतिहासिक क्षण, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संताली में संबोधन कर रचा इतिहास

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जमशेदपुर : करनडीह स्थित दिशोम जाहेरथान प्रांगण सोमवार को इतिहास का साक्षी बना, जब ऑल इंडिया संताली राइटर्स एसोसिएशन एवं दिशोम जाहेरथान कमेटी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित 22वां संताली परसी माहा एवं ओलचिकी शताब्दी समारोह में देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संताली भाषा में संबोधन कर आदिवासी समाज को गौरवान्वित किया। यह आयोजन न केवल एक सांस्कृतिक उत्सव रहा, बल्कि संताली भाषा, ओलचिकी लिपि और जनजातीय अस्मिता के सशक्त स्वर के रूप में उभरा।

राष्ट्रपति ने संताली गीत से की शुरुआत, जाहेर आयो को किया नमन
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अपने संबोधन की शुरुआत संताली नेहोर गीत गाकर की। “जोहार जोहार आयो…” के बोलों के साथ लगभग तीन मिनट तक गाया गया यह गीत पूरे प्रांगण को भावनाओं से भर गया। उन्होंने कहा कि करनडीह आने से पूर्व उन्होंने जाहेर आयो को नमन किया और गुरु गोमके रघुनाथ मुर्मू को श्रद्धांजलि अर्पित की। राष्ट्रपति ने कहा कि उनका जीवन संघर्ष, आस्था और इष्टदेवों के आशीर्वाद का परिणाम है, जिसने उन्हें विभिन्न पड़ावों से गुजरते हुए इस मुकाम तक पहुंचाया।
ओलचिकी संताली समाज की पहचान और एकता का आधार : राष्ट्रपति
राष्ट्रपति ने कहा कि ओलचिकी लिपि केवल एक भाषा माध्यम नहीं, बल्कि संताली समाज की सांस्कृतिक पहचान और आत्मसम्मान का प्रतीक है। संताली राइटर्स एसोसिएशन के योगदान की सराहना करते हुए उन्होंने कहा कि यह संगठन वर्षों से आदिवासी स्वाभिमान और अस्तित्व की रक्षा में अहम भूमिका निभा रहा है। उन्होंने संविधान के संताली (ओलचिकी) अनुवाद का उल्लेख करते हुए कहा कि कानून और अधिकारों की जानकारी मातृभाषा में होना समाज को सशक्त बनाता है, जिससे निर्दोष लोग कानून की जानकारी न होने के कारण दंडित न हों।

जनजातीय समाज के लिए काम करना मेरा कर्तव्य : राष्ट्रपति
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कहा कि देश और दुनिया के विभिन्न हिस्सों में बसे संताल समाज को अपनी भाषा और लिपि से जोड़ना आज की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज में शिक्षित युवाओं की बड़ी संख्या है, ऐसे में अपने अधिकारों और संस्कृति को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी भी उन्हीं की है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि वे समाज और ओलचिकी लिपि के संरक्षण एवं विकास के लिए निरंतर प्रयास करती रहेंगी।

जनजातीय उत्थान की जीवंत मिसाल हैं राष्ट्रपति : राज्यपाल
इस अवसर पर राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार ने कहा कि यह समारोह केवल उत्सव नहीं, बल्कि संस्कृति की जीवंतता का प्रमाण है। उन्होंने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के जीवन संघर्ष को जनजातीय समाज के लिए प्रेरणा बताते हुए कहा कि जमशेदपुर सांप्रदायिक सौहार्द और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक शहर है। राज्यपाल ने स्मरण कराया कि वर्ष 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के कार्यकाल में संताली भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया था। उन्होंने कहा कि ओलचिकी लिपि सांस्कृतिक विरासत है और राज्यपाल भवन जनजातीय भाषाओं के संरक्षण के लिए सदैव तत्पर रहेगा।

संताली और ओलचिकी के विकास में राष्ट्रपति की भूमिका अहम : हेमंत सोरेन
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कहा कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संताली भाषा और ओलचिकी लिपि के विकास में ऐतिहासिक योगदान दिया है। संविधान के संताली अनुवाद को उन्होंने समाज के लिए मील का पत्थर बताया। मुख्यमंत्री ने कहा कि गुरु गोमके रघुनाथ मुर्मू ने संताली समाज को लिपि देकर अलग पहचान दी, जिसके लिए पूरा समाज उनका ऋणी है।

स्कूल शिक्षा में क्षेत्रीय भाषाओं को शामिल करने की मांग
समारोह के दौरान स्वागत भाषण में टीएसएफ के जीरेन टोपनो ने राष्ट्रपति से आग्रह किया कि झारखंड की स्कूली शिक्षा में सभी क्षेत्रीय भाषाओं को शामिल किया जाए और ओलचिकी लिपि में पढ़ाई की व्यवस्था सुनिश्चित हो। उन्होंने कहा कि इससे बच्चों को अपनी भाषा और संस्कृति से जुड़ने का अवसर मिलेगा।

ओलचिकी के साधकों को मिला सम्मान
समारोह के समापन अवसर पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा संताली साहित्य और ओलचिकी लिपि को समृद्ध करने वाले साहित्यकारों एवं शिक्षकों को सम्मानित किया गया। सम्मानित होने वालों में शोभनाथ बेसरा, पद्मश्री डॉ. दमयंती बेसरा, मुचीराम हेम्ब्रॉम, भीमवार मुर्मू, साखी मुर्मू, रामदास मुर्मू, चुंडा सोरेन सिपाही, छोतराय बास्के, निरंजन हंसदा, बी.बी. सुंदरमन, सौरव, शिव शंकर कंडेयांग एवं सी.आर. माझी सहित अन्य शामिल रहे।

ओलचिकी शताब्दी समारोह करनडीह में संताली समाज की सांस्कृतिक चेतना, भाषा गौरव और एकता का प्रतीक बनकर उभरा, जिसने आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जुड़ने का मजबूत संदेश दिया।

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