गुलामी में भी विश्व विजेता रहे मेजर ध्यानचंद को अब तक भारत रत्न क्यों नहीं? उठे फिर सवाल

Raj Sharma
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नई दिल्ली।

भारतीय खेल इतिहास के सबसे चमकते सितारों में शामिल हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद को आज़ाद भारत में अब तक सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न नहीं मिल पाया है। एक बार फिर यह मुद्दा चर्चा में है और इसे लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं कि जिस खिलाड़ी ने गुलामी के दौर में भारत को विश्व विजेता बनाया, उसे आज़ाद भारत ने अब तक वह सम्मान क्यों नहीं दिया, जिसका वह वास्तविक हकदार है।

 

राजनीतिक रणनीतिकार डॉ. अतुल मलिकराम द्वारा सामने रखे गए विचारों ने इस बहस को नई धार दी है। उनका कहना है कि मेजर ध्यानचंद का मामला अब केवल एक खिलाड़ी को सम्मान देने का नहीं, बल्कि भारत के राष्ट्रीय चरित्र और ऐतिहासिक न्याय का प्रश्न बन चुका है।

 

1936 बर्लिन ओलंपिक और राष्ट्र का स्वाभिमान

1936 का बर्लिन ओलंपिक केवल एक खेल प्रतियोगिता नहीं था। एक ओर नाजी जर्मनी अपनी ताकत का प्रदर्शन कर रहा था, वहीं दूसरी ओर एक गुलाम भारत की हॉकी टीम बिना संसाधनों और राजनीतिक समर्थन के मैदान में उतरी थी। उस ओलंपिक में ध्यानचंद की अगुवाई में भारत ने स्वर्ण पदक जीतकर दुनिया को चौंका दिया।

कहा जाता है कि इस ऐतिहासिक जीत के बाद जर्मनी के तानाशाह एडॉल्फ हिटलर ने मेजर ध्यानचंद को अपने देश में उच्च पद और सम्मानजनक जीवन का प्रस्ताव दिया था, जिसे उन्होंने ठुकरा दिया। उस दौर में यह फैसला केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्वाभिमान का प्रतीक था।

 

तीन ओलंपिक स्वर्ण और विश्व में भारत की पहचान

मेजर ध्यानचंद ने 1928, 1932 और 1936 के ओलंपिक खेलों में भारत को लगातार तीन स्वर्ण पदक दिलाए। उनके खेल ने भारत को वैश्विक पहचान दिलाई, उस समय जब देश राजनीतिक रूप से गुलाम था। बिना आधुनिक सुविधाओं और सिस्टम के उन्होंने जो उपलब्धियाँ हासिल कीं, वे आज भी मिसाल हैं।

 

सम्मान मिले, पर सर्वोच्च नहीं

मेजर ध्यानचंद के नाम पर स्टेडियम हैं, डाक टिकट जारी हो चुके हैं, उनकी मूर्तियाँ स्थापित हैं और उनका जन्मदिन राष्ट्रीय खेल दिवस के रूप में मनाया जाता है। बावजूद इसके, भारत रत्न जैसा सर्वोच्च नागरिक सम्मान अब तक उन्हें नहीं दिया गया है।

विशेषज्ञों का कहना है कि भारत रत्न केवल एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि पूरे युग और मूल्यों को सम्मान देता है। यदि यह सम्मान ध्यानचंद को मिलता है, तो वह उस भारत को सम्मान होगा जो गुलामी में भी विजेता था।

 

आज के भारत से सवाल

आज जब भारत ‘अमृत काल’, ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘विश्वगुरु’ बनने की बात कर रहा है, तब यह सवाल और भी प्रासंगिक हो जाता है कि क्या हम अपने अतीत के नायकों के साथ न्याय कर पा रहे हैं? क्या सम्मान का पैमाना लोकप्रियता और बाजार मूल्य तक सीमित हो गया है?

 

सरकार से उम्मीद

डॉ. अतुल मलिकराम का मानना है कि बीते वर्षों में सरकार ने देश के विभिन्न क्षेत्रों के महान व्यक्तित्वों को भारत रत्न देकर ऐतिहासिक गलतियों को सुधारने की कोशिश की है। उसी कड़ी में मेजर ध्यानचंद को भारत रत्न दिया जाना एक साहसिक और ऐतिहासिक फैसला होगा।

 

उनका कहना है कि जिस दिन मेजर ध्यानचंद का नाम भारत रत्न पाने वालों की सूची में शामिल होगा, उस दिन यह सूची वास्तव में पूर्ण मानी जाएगी। यह संदेश जाएगा कि भारत अपने नायकों को भूलता नहीं, भले ही उन्हें याद करने में कभी-कभी देर हो जाए।

 

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