टेलीफोन पर दी गई जातिसूचक गालियों पर SC/ST एक्ट लागू नहीं: कलकत्ता हाईकोर्ट

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चार सप्ताह की अंतरिम राहत, गिरफ्तारी पर रोक

कोलकाता : कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि यदि कथित जातिसूचक गालियां टेलीफोन पर दी गई हों और सार्वजनिक रूप से नहीं, तो ऐसी स्थिति में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के प्रावधान प्रथम दृष्टया लागू नहीं होते। इस आधार पर कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में विशेष कानून के तहत अग्रिम जमानत की याचिका स्वीकार्य नहीं मानी जा सकती।

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक यह टिप्पणी जस्टिस जय सेनगुप्ता ने Case: CRM(A) 4050/2024 में दायर अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए की। याचिका में SC/ST Act की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) सहित अन्य जमानती अपराधों के तहत दर्ज FIR को चुनौती दी गई थी।

याचिकाकर्ता का पक्ष
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने दलील दी कि अग्रिम जमानत की याचिका पूरी तरह स्वीकार्य है, क्योंकि FIR में ही यह उल्लेख है कि कथित गालियां टेलीफोन पर दी गईं, न कि “सार्वजनिक स्थान पर”। जबकि SC/ST Act की उक्त धाराओं के तहत अपराध के लिए सार्वजनिक रूप से अपमान आवश्यक तत्व है। इसके अलावा, FIR में लगाए गए शेष आरोप जमानती प्रकृति के बताए गए।

राज्य का पक्ष
राज्य की ओर से अग्रिम जमानत का विरोध करते हुए केस डायरी और जांच के दौरान दर्ज गवाहों के बयान कोर्ट के समक्ष रखे गए।

कोर्ट की टिप्पणी
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद जस्टिस सेनगुप्ता ने कहा कि यह मामला एक अजीब तथ्यात्मक स्थिति प्रस्तुत करता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि आरोपों को सही भी मान लिया जाए, तो FIR से यही सामने आता है कि कथित गालियां टेलीफोन पर दी गईं, जो कि सार्वजनिक स्थान की परिभाषा में नहीं आतीं। ऐसे में SC/ST Act के प्रावधान प्रथम दृष्टया लागू नहीं होते।

राहत में संशोधन
हालांकि, कोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि याचिकाकर्ता के विरुद्ध लगाए गए अन्य आरोप जमानती हैं। न्यायहित में कोर्ट ने राहत को संशोधित करते हुए आदेश दिया कि :

  • याचिकाकर्ता आदेश की तारीख से चार सप्ताह के भीतर संबंधित क्षेत्राधिकार न्यायालय के समक्ष आत्मसमर्पण कर सकता है।
  • वह नियमित जमानत के लिए आवेदन कर सकता है, जिस पर निचली अदालत कानून के अनुसार विचार करेगी।
  • चार सप्ताह की अवधि तक याचिकाकर्ता की गिरफ्तारी नहीं की जाएगी, जिससे उसे अंतरिम सुरक्षा प्रदान की गई।
  • इन टिप्पणियों और निर्देशों के साथ हाईकोर्ट ने अग्रिम जमानत याचिका का निपटारा कर दिया।
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