जमशेदपुर : शहर की निजी स्कूलों में पढ़ने वाले बीपीएल (गरीबी रेखा से नीचे) वर्ग के छात्रों की शिक्षा पर एक बार फिर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। राज्य सरकार द्वारा दी जाने वाली फीस प्रतिपूर्ति की राशि दिसंबर 2020 के बाद से बंद होने के कारण निजी स्कूलों के सामने गंभीर आर्थिक चुनौती खड़ी हो गई है, जिसका सीधा असर गरीब बच्चों की पढ़ाई पर पड़ रहा है।
शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) के तहत आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ाने के लिए सरकार प्रति छात्र 425 रुपये प्रति माह फीस प्रतिपूर्ति करती थी। इसी व्यवस्था के तहत निजी स्कूलों ने वर्षों तक बीपीएल छात्रों को निःशुल्क शिक्षा दी, लेकिन पिछले चार वर्षों से भुगतान पूरी तरह बंद है।
झारखंड प्राइवेट एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस एसोसिएशन के चेयरपर्सन नकुल कमानी ने इस स्थिति पर गहरी चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि निजी स्कूलों ने सरकार की मंशा के अनुरूप बीपीएल छात्रों को प्रवेश दिया और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दी, लेकिन अब भुगतान न मिलने से स्कूलों पर भारी आर्थिक बोझ पड़ गया है। यह न केवल शिक्षा व्यवस्था के लिए खतरनाक है, बल्कि सरकार की सामाजिक न्याय की नीति पर भी सवाल खड़े करता है।
जमशेदपुर के कई निजी स्कूल टाटा स्टील की लीज की जमीन पर संचालित हो रहे हैं। इन्हें न तो सरकार से मुफ्त जमीन मिली है और न ही किसी तरह का विशेष अनुदान। इसके बावजूद स्कूल वर्षों से बीपीएल छात्रों को पढ़ाते आ रहे हैं। अब फीस प्रतिपूर्ति न मिलने के कारण शिक्षकों का वेतन, भवन किराया, बिजली-पानी का बिल और अन्य शैक्षणिक खर्च उठाना कठिन होता जा रहा है।
स्कूल प्रबंधन का कहना है कि वे बच्चों की पढ़ाई किसी भी हालत में बाधित नहीं करना चाहते, लेकिन सीमित संसाधनों के कारण स्थिति अब असहनीय होती जा रही है। शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार ने जल्द बकाया राशि का भुगतान और नियमित फीस प्रतिपूर्ति की व्यवस्था बहाल नहीं की, तो बीपीएल छात्रों का भविष्य गंभीर रूप से प्रभावित हो सकता है और शिक्षा के अधिकार अधिनियम की मूल भावना कमजोर पड़ जाएगी।





